अयोध्या में कहां हुई रामचरितमानस की रचना, काशी से अयोध्या क्यों आए तुलसीदास
भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी हिंदी साहित्य के अमर कवि और संत हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना श्रीरामचरितमानस को अवधी भाषा में लिखा गया, जो आम जनता तक रामकथा को पहुंचाने का माध्यम बना। लेकिन इस महाकाव्य की रचना के पीछे एक विचित्र और दिव्य घटना जुड़ी हुई है, जो तुलसीदास जी की भक्ति और प्रभु की कृपा को दर्शाती है।
काशी में संस्कृत में रचना का प्रयास
गोस्वामी तुलसीदास जी जब काशी (वाराणसी) में थे, तब उनकी कवित्व शक्ति प्रबल हो उठी। उन्होंने श्रीराम की कथा को संस्कृत भाषा में लिखना शुरू किया। लेकिन एक आश्चर्यजनक घटना घटी, दिन में जो भी वे लिखते, रात में वो स्वयं मिट जाता था। ये क्रम कई दिनों तक चला। इससे तुलसीदास जी अत्यंत व्याकुल और आश्चर्यचकित हो गए।
कहा जाता है कि आठवीं रात को उन्हें स्वप्न में भगवान शिव और माता पार्वती के दर्शन हुए। प्रभु शिव ने उन्हें आदेश दिया कि संस्कृत के स्थान पर अवधी भाषा (जनसामान्य की भाषा) में रामकथा लिखो, क्योंकि यह लोगों के लिए अधिक मंगलकारी और पहुंचयोग्य होगी। शिव जी ने आशीर्वाद दिया कि यह रचना सामवेद के समान फलदायी होगी।
अयोध्या में रामचरितमानस की शुरुआत
शिव आज्ञा मानकर तुलसीदास जी अयोध्या पहुंचे। वहां हनुमानगढ़ी से कुछ दूरी पर राजा फाटक के पास चौरा नामक स्थान पर उन्होंने रामचरितमानस की रचना शुरू की। ये घटना विक्रम संवत 1631 (1574 ई.) की रामनवमी को हुई। इसी स्थान को श्रीरामचरितमानस जन्मभूमि के नाम से जाना जाता है। यहां पहले एक वटवृक्ष (बरगद का पेड़) था, जहां तुलसीदास जी बैठकर रचना करते थे। बाद में इस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण कराया गया और गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रतिमा स्थापित की गई।
रचना की पूर्णता
रामचरितमानस की रचना में लगभग 2 वर्ष, 7 महीने और 26 दिन लगे। यह संवत 1633 में पूर्ण हुई। यह ग्रंथ सात कांडों में विभक्त है और आज भी उत्तर भारत में घर-घर में पढ़ा-पढ़ाया जाता है। तुलसीदास जी की यह रचना न केवल साहित्यिक कृति है, बल्कि भक्ति और रामप्रेम का अमर ग्रंथ है। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और दिव्य प्रेरणा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। आज अयोध्या में राम मंदिर परिसर में तुलसीदास जी की प्रतिमा और भव्य मंदिर की योजना भी उनकी महत्ता को दर्शाती है।




