पूर्व रेल मंत्री और टीएमसी के रणनीतिकार ने कोलकाता में ली अंतिम सांस, 71 वर्ष की आयु में दुनिया को कहा अलविदा
पश्चिम बंगाल की राजनीति में संगठन और रणनीति के पर्याय माने जाने वाले वरिष्ठ नेता और पूर्व रेल मंत्री Mukul Roy का 71 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने कोलकाता के एक निजी अस्पताल में रविवार देर रात लगभग 1:30 बजे अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। परिवार के अनुसार पिछले कुछ महीनों से उनकी सेहत लगातार गिर रही थी, विशेषकर नर्व संबंधी समस्याएं और डिमेंशिया ने उनकी स्थिति को जटिल बना दिया था। हालत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन डॉक्टरों के प्रयास सफल नहीं हो सके। मुकुल रॉय का जाना पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। वे उन नेताओं में गिने जाते थे जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर संगठन को मजबूत किया और चुनावी रणनीति के जरिए राजनीतिक समीकरण बदल दिए।
टीएमसी के संस्थापक स्तंभ
जनवरी 1998 में जब All India Trinamool Congress का गठन हुआ, तब मुकुल रॉय संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। पार्टी के शुरुआती दौर से ही उन्होंने संगठन विस्तार की जिम्मेदारी संभाली। वे लंबे समय तक पार्टी के महासचिव रहे और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क तैयार किया। मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के करीबी सहयोगी के रूप में वे पार्टी में नंबर-2 नेता माने जाते थे। संकट के समय रणनीति बनाना और राजनीतिक हालात को अपने पक्ष में मोड़ना उनकी विशेषता थी। यही कारण था कि उन्हें टीएमसी का ‘क्राइसिस मैनेजर’ कहा जाता था।
दिल्ली की राजनीति और रेल मंत्रालय तक का सफर
मुकुल रॉय 2006 में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए और 2009 से 2012 तक सदन में पार्टी के नेता रहे। United Progressive Alliance (यूपीए-2) सरकार के दौरान उन्होंने पहले शिपिंग मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया। मार्च 2012 में उन्हें देश का रेल मंत्री बनाया गया। उन्होंने यह पद Dinesh Trivedi की जगह संभाला था। रेल मंत्रालय का कार्यभार संभालना उनके राजनीतिक करियर का अहम पड़ाव माना जाता है।
2011 का ऐतिहासिक बदलाव
वर्ष 2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 34 वर्षों से चले आ रहे वाम शासन को समाप्त कर इतिहास रचा। इस चुनाव में रणनीति तैयार करने, उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक समन्वय में मुकुल रॉय की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना गया। राजनीतिक विश्लेषकों ने उन्हें ‘बंगाल की राजनीति का चाणक्य’ की उपाधि दी।
विवाद और दल-बदल
उनका राजनीतिक जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा। शारदा चिटफंड और नारदा स्टिंग मामलों में नाम आने के बाद वे विवादों में घिर गए। पार्टी नेतृत्व से मतभेद बढ़ने पर नवंबर 2017 में उन्होंने टीएमसी छोड़कर Bharatiya Janata Party का दामन थाम लिया। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल में पार्टी के संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य में भाजपा की उल्लेखनीय सफलता का श्रेय भी उन्हें दिया गया। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में वे कृष्णानगर उत्तर सीट से भाजपा विधायक निर्वाचित हुए।
वापसी और अंतिम दौर
जून 2021 में उन्होंने फिर टीएमसी में वापसी की, लेकिन पहले जैसा प्रभाव कायम नहीं रख सके। इसी दौरान उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं बढ़ती रहीं। 13 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने दलबदल विरोधी कानून के तहत उन्हें विधायक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। भाजपा के टिकट पर जीतने के बाद टीएमसी में शामिल होने को इस निर्णय का आधार बनाया गया। मुकुल रॉय का जीवन संगठन निर्माण, रणनीतिक कौशल और राजनीतिक उतार-चढ़ाव की कहानी रहा। समर्थक उन्हें कुशल रणनीतिकार और जुझारू नेता के रूप में याद करेंगे, जबकि आलोचक उनके विवादों को भी चर्चा में रखेंगे। निस्संदेह, वे पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक प्रभाव छोड़ने वाले नेताओं में गिने जाएंगे। उनके निधन से राज्य की राजनीतिक जमीन पर एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।
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