भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए, जो अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 और 86 में शामिल है, विवाहित महिलाओं को दहेज उत्पीड़न, शारीरिक और मानसिक क्रूरता से बचाने के लिए 1983 में लागू की गई थी। इस कानून के तहत, अगर पति या उसके रिश्तेदार पत्नी के साथ क्रूरता करते हैं, तो उन्हें तीन साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है। यह कानून महिलाओं को सशक्त बनाने और घरेलू हिंसा को रोकने का एक मजबूत हथियार था। लेकिन हाल के वर्षों में इसके दुरुपयोग ने इसे “कानूनी आतंकवाद” का रूप दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार इस कानून के गलत इस्तेमाल पर चिंता जताई है। इस धारा 498ए के उद्देश्य, दुरुपयोग, और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों को लखनऊ हाईकोर्ट के अधिवक्ता अखंड पांडेय ने सरल शब्दों में वर्णन किया है आइए समझते है क्या है पूरा मामला?
धारा 498ए का क्या है उद्देश्य और महत्व
धारा 498ए का मुख्य उद्देश्य विवाहित महिलाओं को दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करना था। यह कानून उन मामलों को संबोधित करता है, जहाँ:
पति या उसके रिश्तेदार दहेज की मांग के लिए महिला को प्रताड़ित करते हैं।
शारीरिक या मानसिक क्रूरता की जाती है, जैसे मारपीट, अपमान, या ताने मारना।
महिला या उसके परिवार को संपत्ति या मूल्यवान वस्तुओं की गैरकानूनी मांग के लिए मजबूर किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में क्रूरता की परिभाषा को स्पष्ट किया है:
अमर सिंह बनाम राजस्थान राज्य (2010): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज न लाने के लिए लगातार ताने मारना या पत्नी को बदसूरत कहना क्रूरता के दायरे में आता है।
इंदर राज मलिक बनाम सुनीता मलिक (1986): अदालत ने माना कि दहेज की गैरकानूनी मांग के लिए दबाव डालना धारा 498ए के तहत क्रूरता है।
धारा 498ए का दुरुपयोग: “कानूनी आतंकवाद”
हाल के वर्षों में धारा 498ए के दुरुपयोग ने समाज और न्याय व्यवस्था में गंभीर सवाल उठाए हैं। कुछ मामलों में, इस कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत दुश्मनी, तलाक, या गुजारा भत्ता हासिल करने के लिए हथियार के रूप में किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे “कानूनी आतंकवाद” करार दिया है। प्रमुख मामले इस प्रकार हैं:
सुशील कुमार शर्मा बनाम भारत संघ (2005): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 498ए का दुरुपयोग तलाक, उच्च गुजारा भत्ता, या निजी लाभ के लिए किया जा रहा है। यह कानून निर्दोष लोगों को फंसाने का हथियार बन गया है।
कहकशां कौसर बनाम बिहार राज्य (2022): कोर्ट ने चिंता जताई कि वैवाहिक विवादों में पति और उसके परिवार को निशाना बनाने के लिए सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाए जाते हैं।
गीता मेहरोत्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2012): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों में पूरे परिवार को बिना सबूत के फंसाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, खासकर शादी के शुरुआती वर्षों में।
दारा लक्ष्मी नारायण बनाम तेलंगाना राज्य (2024): कोर्ट ने एक झूठा मामला खारिज करते हुए कहा कि बिना ठोस सबूत के सामान्य आरोपों को शुरू में ही खत्म करना चाहिए, ताकि कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग रोका जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश: दुरुपयोग को रोकने की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 498ए के दुरुपयोग को रोकने और निर्दोष लोगों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाने के लिए कई दिशानिर्देश जारी किए हैं:
अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014): कोर्ट ने कहा कि धारा 498ए के तहत गिरफ्तारी तभी होनी चाहिए, जब शिकायत की सत्यता की जाँच हो जाए। पुलिस को मनमानी गिरफ्तारी से बचना चाहिए।
राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2017): सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित दिशानिर्देश दिए:
शिकायतों की जाँच केवल नामित जाँच अधिकारी द्वारा होनी चाहिए।
परिवार के सभी सदस्यों, खासकर दूर रहने वालों की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य नहीं होनी चाहिए।
दारा लक्ष्मी नारायण (2024): कोर्ट ने धारा 482 CrPC के तहत उच्च न्यायालयों से कहा कि वे झूठे मामलों को शुरू में ही खत्म करें, ताकि व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए कानून का दुरुपयोग न हो।
सामाजिक और कानूनी प्रभाव
धारा 498ए का दुरुपयोग न केवल परिवारों को तोड़ रहा है, बल्कि वास्तविक पीड़ित महिलाओं के लिए भी चुनौतियाँ पैदा कर रहा है। झूठे मामलों की बढ़ती संख्या के कारण:
न्याय व्यवस्था पर बोझ: कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है।
वास्तविक पीड़ितों पर असर: झूठे मामलों के कारण असली पीड़ितों की शिकायतें शक के दायरे में आ रही हैं।
निर्दोष लोगों का उत्पीड़न: पति और उनके परिवार को बिना सबूत के लंबी कानूनी लड़ाई झेलनी पड़ती है।
समाधान के लिए सुझाव
धारा 498ए के दुरुपयोग को रोकने और इसका सही उपयोग सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
जागरूकता और काउंसलिंग: वैवाहिक विवादों को सुलझाने के लिए परिवार परामर्श केंद्रों को मजबूत करना।
कठोर जाँच प्रक्रिया: शिकायत दर्ज होने से पहले पुलिस को गहन जाँच करनी चाहिए।
शिक्षा और संवेदनशीलता: समाज में प्रेम, सम्मान, और वैवाहिक जिम्मेदारियों के बारे में जागरूकता बढ़ानी चाहिए।
कानूनी सुधार: झूठे मामलों के लिए सजा का प्रावधान और त्वरित जाँच की व्यवस्था लागू की जाए।
धारा 498ए महिलाओं को दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से बचाने के लिए एक महत्वपूर्ण कानून है, लेकिन इसका दुरुपयोग “कानूनी आतंकवाद” के रूप में सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश और फैसले इस दुरुपयोग को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। समाज, पुलिस, और न्याय व्यवस्था को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि यह कानून केवल वास्तविक पीड़ितों की रक्षा के लिए उपयोग हो, न कि Alt: कि व्यक्तिगत प्रतिशोध का हथियार।
लेखक के बारे में
लेखक: अखंड पांडेय
अखंड पांडेय लखनऊ हाईकार्ट में वकील है जो कि सामाजिक विश्लेषक हैं, जो कानूनी और सामाजिक मुद्दों पर जानकारी रखते है। अखंड महिलाओं के अधिकारों और कानूनी सुधारों के लिए समर्पित हैं।




