हादसा जिसने बदल दिया जीवन
गाजियाबाद के हरीश राणा की कहानी किसी को भी अंदर तक झकझोर देती है। जुलाई 2010 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लेने के बाद उनका जीवन सामान्य था, लेकिन अगस्त 2013 में एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया। पीजीआई चंडीगढ़ की चौथी मंजिल से गिरने के बाद हरीश गंभीर रूप से घायल हो गए। डॉक्टरों ने उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया बताया, जिसके कारण उनके हाथ-पैर निष्क्रिय हो गए और जीवन भर बिस्तर पर रहने को मजबूर होना पड़ा। इसके बाद हरीश का जीवन दर्द और संघर्ष से भरा रहा। परिवार ने हर संभव इलाज और देखभाल की, लेकिन उनके शरीर की हालत लगातार बिगड़ती रही। 2013 से अब तक हरीश का जीवन केवल बिस्तर और चिकित्सा मशीनों तक सीमित रह गया।
एम्स में अंतिम चरण
नई दिल्ली के एम्स अस्पताल में हरीश राणा की हालत अब बेहद नाजुक है। डॉक्टरों ने निर्णय लिया है कि उन्हें अब कोई ऑक्सीजन सपोर्ट नहीं दिया जाएगा और जल्द ही पानी भी बंद कर दिया जाएगा। इस प्रक्रिया के तहत जीवन रक्षक उपकरणों को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। हर पल डॉक्टर उनकी निगरानी कर रहे हैं, लेकिन हरीश का दर्द और उनकी असहाय स्थिति को देखना किसी के लिए भी असंभव है। यह सोचकर दिल टूट जाता है कि इस कठिन समय में उनके पास कोई अपना नहीं है। परिवार और कानून की प्रक्रियाएं उनकी जिंदगी के अंतिम क्षणों को नियंत्रित कर रही हैं।
कानूनी प्रक्रिया और इच्छामृत्यु
हरीश के माता-पिता ने उनकी स्थिति को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अपील की थी। हालांकि जुलाई 2025 में हाईकोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दी। इसके बाद हरीश को गाजियाबाद से दिल्ली स्थित एम्स लाया गया, जहां उनका इलाज और देखभाल चल रही है। यह निर्णय चिकित्सा विज्ञान, कानूनी प्रक्रियाओं और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक कठिन मोड़ है।
दर्द और असहायपन
हरीश राणा का जीवन अब केवल मशीनों और प्रक्रियाओं तक सीमित है। उनके हाथ-पैर निष्क्रिय हैं, उन्हें अपनी जरूरतों के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह सोचकर कोई भी भावुक हो सकता है कि किसी का अपना भी उनके पास नहीं है। परिवार की उम्मीदें, कानूनी अनुमति और डॉक्टरों की देखभाल के बीच हरीश का जीवन धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। हर पल, हर धड़कन, हर निगाह उनके दर्द और असहायपन को बयां करती है।
अंतिम विचार
हरीश राणा की कहानी हमें जीवन और मानवता की नाजुकता का एहसास कराती है। यह दिखाती है कि कभी-कभी इंसान अपने शरीर और परिस्थितियों के चलते पूरी तरह असहाय हो जाता है। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि जीवन केवल सांस लेने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अपने प्रियजनों और समाज के समर्थन के साथ ही जीने का अनुभव भी अहम होता है। हरीश का दर्द और उनके परिवार की लड़ाई हमारी संवेदनाओं को झकझोरती है। उनकी कहानी, चाहे悲दाई हो, हमें जीवन, प्यार और मानवता के महत्व की याद दिलाती है।
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