इच्छा मृत्यु और हरीश राणा की कहानी
भारत में इच्छा मृत्यु के पहले मामले में गाजियाबाद निवासी हरीश राणा का निधन मंगलवार को AIIMS Delhi में हुआ। वह पिछले लगभग 13 वर्षों से कोमा में थे और सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद उन्हें इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया में रखा गया। इस प्रक्रिया में उनकी जीवनरक्षक साधन और पोषण धीरे-धीरे हटा दिए गए। हरीश राणा की स्थिति लंबे समय से गंभीर थी, और उनके परिवार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेकर उन्हें सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार के अधिकार के साथ इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया में रखा। इस दौरान उनका दर्द कम करने के लिए नियमित रूप से दवाएं और चिकित्सा देखभाल जारी रखी गई।
इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया कैसे होती है
इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया में मरीज को किसी भी प्रकार का अतिरिक्त कष्ट न हो, इसका ध्यान रखा जाता है। हरीश राणा के मामले में इसे पैसिव यूथेनेशिया के तहत किया गया। इसमें जीवनरक्षक उपकरण हटाना और भोजन एवं पानी धीरे-धीरे बंद करना शामिल होता है। हरीश को 14 मार्च को एम्स में भर्ती कराया गया। इसके बाद 15 मार्च से उनका तरल भोजन बंद किया गया और 17 मार्च से पानी देना भी रोका गया। डॉक्टर्स का कहना है कि लंबे समय से कोमा में होने के कारण उनके शरीर में इस प्रक्रिया के दौरान कोई असामान्य प्रतिक्रिया नहीं देखी गई।
दर्द रहित अंतिम समय सुनिश्चित करना
इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि मरीज की अंतिम अवस्था शांत और बिना कष्ट के बीते। डॉक्टरों ने हरीश को नियमित रूप से दर्द निवारक दवाएं और अन्य जरूरी उपचार दिए ताकि उनकी मौत मानवीय और सम्मानजनक तरीके से हो। हाथ से दिए जाने वाले पोषण और जीवनरक्षक उपकरण हटाने के बावजूद मरीज को किसी भी प्रकार की पीड़ा न हो, इसके लिए चिकित्सक पूरी सतर्कता बरतते हैं। यह प्रक्रिया केवल गंभीर, अनहोनी और असाध्य रोगों में ही अपनाई जाती है, जब मरीज की जीवन गुणवत्ता बहुत कम हो और कोई इलाज लाभकारी न हो।
13 साल से कोमा में जीवन
हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से कोमा में थे। इतने लंबे समय तक कोमा में रहने के कारण उनके शरीर की प्राकृतिक प्रतिक्रिया धीमी हो गई थी। सामान्य व्यक्ति में लंबे समय तक भोजन और पानी न मिलने से बेचैनी और दर्द के लक्षण दिखाई देते हैं, लेकिन हरीश की स्थिति स्थिर बताई जा रही थी। उनकी लंबी बीमारी और कोमा में जीवन ने परिवार और चिकित्सकों के लिए यह फैसला कठिन बनाया। सुप्रीम कोर्ट की अनुमति मिलने के बाद, यह सुनिश्चित किया गया कि अंतिम समय मानवीय और सम्मानजनक तरीके से बिते।
सुप्रीम कोर्ट की अनुमति और कानूनी पहलू
इच्छा मृत्यु भारत में अब धीरे-धीरे कानूनी मान्यता प्राप्त कर रही है। हरीश राणा के मामले ने इसे और भी चर्चा का विषय बना दिया। सुप्रीम कोर्ट ने परिवार को अनुमति दी थी, जिसके बाद मरीज को उचित चिकित्सा देखभाल के साथ पैसिव यूथेनेशिया प्रक्रिया में रखा गया। इस अनुमति का मुख्य उद्देश्य मरीज और परिवार को मानवीय सम्मान देना और अंतिम समय को दर्द रहित बनाना था। यह मामला भविष्य में इच्छा मृत्यु के कानूनी और नैतिक पहलुओं पर बहस का आधार बन सकता है। हरीश राणा का निधन भारत में इच्छा मृत्यु का पहला प्रचलित मामला बन गया। उनकी अंतिम यात्रा ने यह दिखाया कि चिकित्सा, कानूनी अनुमति और परिवार की देखभाल के माध्यम से मरीज का अंतिम समय शांत और सम्मानजनक तरीके से बिताया जा सकता है। इस घटना ने भारतीय समाज और चिकित्सा क्षेत्र में इच्छा मृत्यु और पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया को समझने का अवसर प्रदान किया। साथ ही यह कानूनी और नैतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे भविष्य में गंभीर बीमारियों में दर्द रहित मृत्यु के मार्ग को परिभाषित किया जा सकता है।
यह भी पढ़े
https://www.tarangvoice.com/manish-malhotras-mother-garima-malhotra-passed-away/




