उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों के विलय को लेकर लखनऊ हाई कोर्ट की बेंच ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने 7 जुलाई 2025 को सीतापुर की कृष्णा कुमारी समेत 51 स्कूली बच्चों और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के 16 जून 2025 के उस आदेश को संवैधानिक और जनहित में ठहराया, जिसमें 50 से कम छात्रों वाले प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों को नजदीकी स्कूलों में विलय करने का निर्णय लिया गया था। यह फैसला योगी सरकार की शिक्षा गुणवत्ता सुधार और संसाधन उपयोग की नीति को न्यायिक स्वीकृति प्रदान करता है। इस फैसले के महत्व, याचिकाकर्ताओं और सरकार की दलीलों, और इसके दूरगामी प्रभावों पर लखनऊ हाईकोर्ट के अधिवक्ता अखंड पांडेय ने विस्तार से चर्चा की।
लखनऊ हाई कोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21Aके तहत 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार तो सुनिश्चित है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है कि स्कूल हर बच्चे के घर से एक किलोमीटर की दूरी के भीतर ही हो। कोर्ट ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के नियमों की व्याख्या इस तरह होनी चाहिए जिससे कार्यशील और व्यावहारिक रहें। कोर्ट ने कहा कि यदि कोर्ट याचिकाकर्ताओं की दलील को स्वीकार करे तो एक्ट के मुताबिक 300 की आबादी पर एक किलोमीटर के दायरे में स्कूल होना जरूरी है, जिसकी वजह से इतनी बड़ी जनसंख्या वाले राज्य यूपी को 8 लाख स्कूल बनाने पड़ेंगे, जो संसाधनों और वित्तीय स्थिति के दृष्टि से अप्रासांगिक है।
हाई कोर्ट का फैसला: संवैधानिकता और जनहित की जीत
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने यह भी उल्लेख किया कि सरकार का यह निर्णय राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप है, जो स्कूलों की जोड़ी (पेयरिंग) और संसाधनों के बेहतर उपयोग पर जोर देती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार का दायित्व है कि वह बच्चों को शिक्षा से वंचित न होने दे, और यदि स्कूल नजदीक स्थापित करना संभव नहीं है, तो परिवहन सुविधाएँ प्रदान की जाएँ।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें: RTE और अनुच्छेद 21A का हवाला
याचिकाकर्ताओं, जिनमें सीतापुर के 50 प्राथमिक और एक उच्च प्राथमिक स्कूल के छात्र शामिल थे, ने सरकार के 16 जून 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एल.पी. मिश्रा और गौरव मेहरोत्रा ने दलील दी कि:
- स्कूलों का विलय जो RTE एक्ट और अनुच्छेद 21A का उल्लंघन करता है, ये एक्ट 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है।
- RTE नियमों के अनुसार, 300 की आबादी वाले क्षेत्र में एक किलोमीटर के दायरे में स्कूल होना चाहिए।
- स्कूलों के विलय से बच्चों को दूर के स्कूलों में जाना पड़ेगा, जिससे उनकी शिक्षा बाधित होगी और ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की पढ़ाई पर विशेष रूप से असर पड़ेगा।
- कोर्ट ने कहा ये निर्णय मनमाना और अवैध है, क्योंकि ये शिक्षा के मौलिक अधिकार को कमजोर करता है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि यदि एक भी बच्चा एक किलोमीटर के दायरे में है, तो स्कूल स्थापित करना सरकार की जिम्मेदारी है।
सरकार की दलील: संसाधनों का बेहतर उपयोग और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अनुज कुदेसिया, मुख्य स्थायी अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार सिंह, और बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) सीतापुर के अधिवक्ता संदीप दीक्षित ने कोर्ट में दलील दी कि:
- स्कूलों का विलय नहीं, बल्कि पेयरिंग की जा रही है, ताकि कम छात्रों वाले स्कूलों को नजदीकी स्कूलों के साथ जोड़ा जाए।
- इस कदम का उद्देश्य शिक्षकों, पुस्तकालय, खेलकूद, और स्मार्ट क्लास जैसी सुविधाओं को एकीकृत कर बच्चों को बेहतर शिक्षा प्रदान करना है।
- राज्य में 29,000 स्कूलों में 50 से कम छात्र हैं, और 56 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं है, जिससे संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है- स्कूलों की दूरी 2-2.5 किलोमीटर तक हो सकती है, जो बच्चों के लिए असुविधाजनक नहीं है, और सरकार परिवहन सुविधाएँ प्रदान करने को तैयार है।
- यह निर्णय NEP 2020 के तहत संसाधनों के बेहतर उपयोग और ड्रॉपआउट दर को कम करने के लिए लिया गया है
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि स्कूलों को बंद नहीं किया जा रहा, बल्कि इन्हें बाल वाटिका और आंगनबाड़ी के रूप में प्री-प्राइमरी कक्षाओं के लिए उपयोग किया जाएगा
कोर्ट का तर्क: व्यावहारिकता और संसाधनों का संतुलन
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने अपने फैसले में RTE एक्ट के नियम 4(1), 4(2), और 4(3) का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार का दायित्व है कि वह बच्चों को नजदीकी स्कूलों में शिक्षा प्रदान करे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर 300 की आबादी पर एक किलोमीटर के दायरे में स्कूल स्थापित करना अनिवार्य है। कोर्ट ने माना कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में, जहाँ 24 करोड़ की आबादी* और सीमित संसाधन हैं, ऐसी व्याख्या अव्यवहारिक होगी
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि स्कूल नजदीक स्थापित करना संभव नहीं है, तो सरकार को परिवहन सुविधाएँ या अन्य वैकल्पिक व्यवस्थाएँ करनी होंगी। यह निर्णय संवैधानिक और व्यावहारिक दोनों दृष्टिकोण से सही है, क्योंकि यह शिक्षा की गुणवत्ता और संसाधनों के उपयोग को प्राथमिकता देता है।
शिक्षकों और अभिभावकों की चिंताएँ
स्कूलों के विलय से शिक्षकों और अभिभावकों में कई चिंताएँ हैं:
- शिक्षकों की नौकरी: विलय के बाद छात्र-शिक्षक अनुपात के आधार पर शिक्षकों की तैनाती होगी, जिससे सरप्लस शिक्षकों को दूर के स्कूलों में स्थानांतरित किया जाएगा। उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ ने इस नीति का विरोध करते हुए 8 जुलाई 2025 को राज्यव्यापी धरना देने की घोषणा की थी।
- बच्चों की शिक्षा: ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की दूरी बढ़ने से बच्चों, खासकर लड़कियों, की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। अभिभावकों का कहना है कि परिवहन सुविधाओं की कमी और सुरक्षा चिंताएँ शिक्षा तक पहुँच को और कठिन बनाएँगी।
- निजीकरण की आशंका: बंद होने वाले स्कूलों में प्री-प्राइमरी कक्षाओं के लिए निजी स्टाफ की नियुक्ति से निजीकरण की आशंका बढ़ रही है। विपक्षी दलों, जैसे कांग्रेस, सपा, और बसपा, ने इसे शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन बताया है।
सामाजिक और शैक्षिक प्रभाव
हाई कोर्ट के इस फैसले के कई दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं: - शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार: स्कूलों की पेयरिंग से संसाधनों का एकीकृत उपयोग होगा, जिससे स्मार्ट क्लास, पुस्तकालय, और खेल सुविधाएँ बच्चों को उपलब्ध हो सकती हैं।
- ग्रामीण बच्चों की चुनौतियाँ: ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की दूरी बढ़ने से ड्रॉपआउट दर बढ़ सकती है, खासकर उन परिवारों में जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं।
- शिक्षकों की जवाबदेही: शिक्षकों को अब नामांकन बढ़ाने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की जिम्मेदारी लेनी होगी, ताकि भविष्य में स्कूल बंद होने की नौबत न आए।
- निजीकरण का खतरा: बंद स्कूलों में निजी स्टाफ की नियुक्ति से सरकारी शिक्षा व्यवस्था कमजोर हो सकती है, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव शिक्षा की निष्पक्षता पर पड़ सकता है।
समाधान और सुझाव
स्कूलों के विलय को प्रभावी और निष्पक्ष बनाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
- परिवहन सुविधाएँ: ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों के लिए सुरक्षित और मुफ्त परिवहन व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
- शिक्षकों की तैनाती: सरप्लस शिक्षकों को स्थानांतरित करने से पहले उनकी समस्याओं का समाधान हो, जैसे आवास और यात्रा भत्ता।
- जागरूकता अभियान: अभिभावकों को सरकारी स्कूलों की सुविधाओं और मिड डे मील योजना के लाभों के बारे में जागरूक किया जाए।
- निजी स्कूलों पर नियंत्रण: RTE नियमों का सख्ती से पालन हो, ताकि सरकारी स्कूलों के एक किलोमीटर दायरे में निजी स्कूलों को मान्यता न दी जाए।
- निगरानी तंत्र: स्कूलों में बायोमैट्रिक हाजिरी और गुणवत्ता निगरानी तंत्र लागू किया जाए, ताकि शिक्षकों की जवाबदेही सुनिश्चित हो।
लखनऊ हाई कोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश में शिक्षा सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अखंड कुमार पांडेय, जो सामाजिक कार्यों और न्याय अभियानों में सक्रिय हैं, इस फैसले को शिक्षा की गुणवत्ता और संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में एक सकारात्मक कदम मानते हैं। हालांकि, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि ग्रामीण बच्चों की शिक्षा और शिक्षकों की नौकरी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। स्कूलों की पेयरिंग और संसाधनों का एकीकृत उपयोग तभी सफल होगा, जब इसे पारदर्शी और समावेशी तरीके से लागू किया जाए। “हर बच्चे को शिक्षा, हर स्कूल में गुणवत्ता” का संकल्प इस नीति का आधार होना चाहिए।






