क्या इस बार विचारधारा की राजनीति को मिल पाएगा युवा जनसमर्थन?
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की रणभेरी बज चुकी है और पहले चरण के नामांकन ने राजनीति के कई नए संकेत दे दिए हैं। इस चरण में 18 जिलों की 121 सीटों के लिए 1198 उम्मीदवारों ने पर्चा दाखिल किया है। यह आंकड़ा साफ तौर पर बताता है कि इस बार चुनावी मैदान केवल राजनीतिक दलों और गठबंधनों तक सीमित नहीं रह गया है – यह अब पहचान, छवि, सामाजिक प्रभाव और विचारधारा की लड़ाई बन गया है।
दिग्गजों की साख बनाम नए चेहरों की चुनौती
राजनीति में इस बार कई नए और लोकप्रिय चेहरे अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। जहां एक ओर भाजपा के वरिष्ठ नेता और स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय जैसे अनुभवी दिग्गज सीवान से मैदान में हैं, वहीं दूसरी ओर फिल्मी और सांस्कृतिक जगत के सितारे भी मैदान में उतर आए हैं।
खेसारी लाल यादव, भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार, छपरा से चुनाव लड़ रहे हैं।
मैथिली ठाकुर, मिथिला की प्रसिद्ध लोकगायिका, अलीनगर से मैदान में हैं।
दीपा मांझी, पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की बहू, इमामगंज से जेडीयू की प्रत्याशी हैं।
ये सभी चेहरे इस बार चुनाव को नया आयाम दे रहे हैं। सोशल मीडिया की ताकत, युवाओं के जुड़ाव और जनभावनाओं की पकड़ इनके सबसे बड़े हथियार हैं।
महागठबंधन की कसौटी: विचारधारा बनाम लहर
महागठबंधन, जिसे अब INDIA गठबंधन कहा जा रहा है, इस बार अपनी विचारधारा-आधारित राजनीति और सामाजिक न्याय के एजेंडे को लेकर मैदान में उतरा है। तेजस्वी यादव की अगुआई में राजद ने MY समीकरण (यादव-मुस्लिम) को बरकरार रखते हुए पिछड़े, दलित और महिला मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश की है।
इस बार गठबंधन को चुनौती इस बात की है कि क्या वह महंगाई, बेरोजगारी और शिक्षा जैसे मुद्दों को चुनावी विमर्श में केंद्र में ला पाएगा, या फिर स्टार अपील और पहचान की राजनीति इन मुद्दों को पीछे छोड़ देगी?
नई राजनीति की बुनियाद: सोशल मीडिया और युवाशक्ति
2025 का चुनाव इस मायने में भी खास है कि युवाओं और सोशल मीडिया की भूमिका अब निर्णायक बन चुकी है। नए उम्मीदवारों में से कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक्टिव हैं। इनके फॉलोअर्स की संख्या लाखों में है, जो चुनाव प्रचार का तरीका पूरी तरह बदल रहे हैं।
अब सभा, पोस्टर और रोड शो से कहीं ज्यादा असरदार इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब वीडियो और लाइव सेशन साबित हो रहे हैं।
जनता के सामने बड़ा सवाल: छवि या नीति?
इतनी बड़ी संख्या में उम्मीदवारों का होना यह दिखाता है कि बिहार की राजनीति अब केवल जातीय समीकरण या पार्टी पहचान पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत छवि, लोकप्रभाव और नैरेटिव की ओर बढ़ चुकी है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि जनता किसे चुनेगी –
वह चेहरा जो जनता को पहचान से जोड़ता है,
या वह नेता जो वर्षों से सामाजिक मुद्दों के लिए प्रतिबद्ध रहा है?
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का पहला चरण एक साफ संकेत दे रहा है – यह सिर्फ सीटों का नहीं, नई राजनीति बनाम पुरानी परंपरा का चुनाव है। जहां एक ओर जनभावनाएं और स्टारडम अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विचारधारा, अनुभव और सामाजिक न्याय की राजनीति अपनी साख बचाने में जुटी है।
अब फैसला बिहार की जनता को करना है – क्या वे चमकते चेहरों की ओर बढ़ेंगे या सोच-समझकर नीति और प्रतिबद्धता के साथ खड़े होंगे?



