NEET PG कटऑफ विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, माइनस कटऑफ के खिलाफ डॉक्टरों की जनहित याचिका
देशभर के मेडिकल कॉलेजों में खाली पड़ी पोस्टग्रैजुएट (PG) सीटों को भरने के लिए NEET PG में कटऑफ को शून्य पर्सेंटाइल और स्कोर को माइनस 40 तक घटाने के फैसले ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। इस फैसले के खिलाफ रेजिडेंट डॉक्टरों ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। डॉक्टरों का कहना है कि इस तरह के कदम से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
क्या है पूरा मामला
नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने हाल ही में एक नोटिस जारी कर कुछ कैटेगरी के लिए NEET PG की न्यूनतम क्वालिफाइंग कटऑफ को जीरो पर्सेंटाइल कर दिया। इसके साथ ही प्रवेश के लिए न्यूनतम स्कोर को माइनस 40 तक घटाने की अनुमति दी गई। इसका उद्देश्य देशभर के मेडिकल कॉलेजों में खाली रह गई पीजी सीटों को भरना बताया गया है। हालांकि, इस फैसले के बाद मेडिकल समुदाय में नाराजगी बढ़ गई है। रेजिडेंट डॉक्टरों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर कटऑफ घटाने से ऐसे उम्मीदवारों को भी पीजी में दाखिला मिल सकता है, जिनके पास जरूरी शैक्षणिक योग्यता और व्यावहारिक दक्षता नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई जनहित याचिका
डॉक्टरों के संगठन यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (UDF) ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की है। याचिका UDF के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्य मित्तल और अन्य रेजिडेंट डॉक्टरों की ओर से दाखिल की गई है। इसमें NBEMS द्वारा जारी उस नोटिस को रद्द करने की मांग की गई है, जिसके जरिए पीजी मेडिकल प्रवेश के मानकों में ऐतिहासिक कटौती की गई। याचिका में कहा गया है कि यह फैसला न सिर्फ मेडिकल शिक्षा के स्तर को गिराएगा, बल्कि इसका सीधा असर मरीजों की देखभाल और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा।
डॉक्टर क्यों कर रहे हैं विरोध
रेजिडेंट डॉक्टरों का कहना है कि पोस्टग्रैजुएट मेडिकल कोर्स सामान्य पढ़ाई नहीं, बल्कि अत्यधिक जिम्मेदारी वाला प्रशिक्षण होता है। पीजी डॉक्टर ही अस्पतालों में मरीजों के इलाज, सर्जरी और इमरजेंसी सेवाओं में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में कम योग्यता वाले उम्मीदवारों को प्रवेश देना जोखिम भरा साबित हो सकता है। डॉक्टरों का तर्क है कि जीरो पर्सेंटाइल और माइनस स्कोर जैसे मानदंड मेडिकल शिक्षा की गंभीरता को कम करते हैं। इससे मेहनत कर अच्छे अंक लाने वाले छात्रों के साथ भी अन्याय होगा और मेरिट सिस्टम पर सवाल खड़े होंगे।
मरीजों की सुरक्षा पर खतरे की आशंका
याचिका में यह भी कहा गया है कि अगर कमजोर शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को पीजी मेडिकल ट्रेनिंग दी जाती है, तो इसका सीधा असर मरीजों की जान और स्वास्थ्य पर पड़ेगा। मेडिकल शिक्षा का स्तर गिरने से गलत इलाज, चिकित्सकीय लापरवाही और अस्पतालों में जोखिम बढ़ सकता है। डॉक्टरों का मानना है कि सीटें खाली रहने की समस्या का समाधान योग्यता से समझौता करके नहीं, बल्कि बेहतर योजना और नीतिगत सुधारों से किया जाना चाहिए।
सरकार और NBEMS का पक्ष
NBEMS और संबंधित प्राधिकरणों का तर्क है कि हर साल बड़ी संख्या में पीजी सीटें खाली रह जाती हैं, जिससे मेडिकल संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं हो पाता। इसी वजह से कटऑफ में अस्थायी रूप से ढील दी गई है ताकि ज्यादा छात्रों को अवसर मिल सके। हालांकि, डॉक्टरों के संगठन इसे अल्पकालिक समाधान बताते हुए खारिज कर रहे हैं और इसे मेडिकल सिस्टम के लिए खतरनाक कदम मान रहे हैं।
आगे क्या हो सकता है
अब इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट की नजर है। अदालत के फैसले से यह तय होगा कि NEET PG में कटऑफ घटाने का यह निर्णय बरकरार रहेगा या इसमें बदलाव किया जाएगा। यह मामला न सिर्फ मेडिकल छात्रों, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। डॉक्टरों और छात्रों की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश पर टिकी हैं।
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