Ladakh की बर्फीली वादियां, ऊंचे पहाड़ और शांत ग्लेशियर लंबे समय से एक अनदेखी समस्या को अपने भीतर समेटे हुए थे। यह समस्या थी युद्धकालीन कबाड़ की, खासतौर पर लोहे के जेरिकैन, जो 1962 के बाद से सीमावर्ती इलाकों में बिखरे पड़े थे। अब Indian Army ने इस पुराने बोझ को हटाने के लिए एक बड़ा और ऐतिहासिक स्वच्छता अभियान शुरू किया है।
यह अभियान उत्तरी कमान के नेतृत्व में चलाया जा रहा है और इसे सिर्फ सफाई का काम नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जिम्मेदारी का उदाहरण माना जा रहा है। दरअसल, 1962 के बाद जब सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कें नहीं थीं, तब सेना को राशन, केरोसिन और अन्य जरूरी सामान हवाई मार्ग से भेजना पड़ता था। इन सामग्रियों को लोहे के जेरिकैन में भरकर अग्रिम चौकियों तक पहुंचाया जाता था। समय के साथ ये जेरिकैन वहीं छूटते गए और हजारों की संख्या में जमा हो गए।
इस दिशा में सबसे पहले साल 2004 में पहल हुई, जब आर्मी सर्विस कोर में कर्नल P. S. Bindra ने एमएसटीसी के जरिए स्क्रैप की ई-नीलामी करवाई। यह कदम एक अहम शुरुआत साबित हुआ और आज इसी मॉडल को देशभर में अपनाया जा रहा है।
कर्नल बिंद्रा, जो करनाल के वरिष्ठ नागरिक आयाम की पर्यावरण शाखा से जुड़े हैं, ने इस अभियान को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में आगे बढ़ाया। उनके साथ Mohammad Raj Khan और Stenzin Dorje (वीरू) का योगदान भी बेहद महत्वपूर्ण रहा। इन लोगों ने जमीनी स्तर पर इस समस्या को सामने लाने में अहम भूमिका निभाई। खासतौर पर ग्लेशियर क्षेत्र से 1944 का एक जेरिकैन मिलना इस अभियान का टर्निंग प्वाइंट बना।
इसके बाद मुख्यालय उत्तरी कमान ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और इसे मिशन के रूप में शुरू किया। अब स्थिति यह है कि आर्मी सर्विस कोर के वाहन, जो आगे चौकियों तक सामान पहुंचाते हैं, वापसी में पुराने जेरिकैन और अन्य कबाड़ भी साथ लेकर आ रहे हैं।
इकट्ठा किए गए इस हजारों टन कबाड़ को व्यवस्थित तरीके से जमा कर MSTC Limited को ई-नीलामी के लिए सौंपा जा रहा है। इससे जहां एक तरफ लद्दाख की धरती साफ हो रही है, वहीं दूसरी ओर इससे देश को आर्थिक लाभ भी मिल रहा है।
यह पहल भारतीय सेना के उस व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें सिर्फ सीमा की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि पर्यावरण की रक्षा भी उतनी ही जरूरी मानी जाती है।
आज लद्दाख के पहाड़ धीरे-धीरे दशकों पुराने लोहे के इस कबाड़ से मुक्त हो रहे हैं। यह अभियान एक नए भारत की सोच को दिखाता है, जहां विकास, सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चलते हैं।



