राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए विधेयकों की मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अदालत राज्यपाल की भूमिका को टेकओवर नहीं कर सकती। यह निर्णय राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा विधेयकों की मंजूरी की प्रक्रिया में समय-सीमा तय करने से जुड़ी लंबी सुनवाई के बाद आया। सीजेआई की अध्यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान ने राज्यपाल और राष्ट्रपति को जो लचीलापन दिया है, उसे अदालत अधिनियमित समयसीमा लागू करके प्रभावित नहीं कर सकती।

अनुच्छेद 200 और राज्यपाल की शक्तियां

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प हैं – वह विधेयक को मंजूरी दे सकते हैं, उसे रोककर विधानसभा को वापस भेज सकते हैं, या राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई चौथा विकल्प नहीं है। हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि राज्यपाल किसी विधेयक पर अनिश्चित काल तक रोक नहीं लगा सकते, लेकिन इसे लागू करने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित करना संवैधानिक रूप से सही नहीं है।

तमिलनाडु मामले का जिक्र

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मामले का भी हवाला दिया, जिसमें दो जजों की पीठ ने कुछ विधेयकों पर समयसीमा लागू करने का निर्देश दिया था। संविधान पीठ ने इसे असंवैधानिक बताया और कहा कि न्यायालय राज्यपाल या राष्ट्रपति की शक्तियों को अधिग्रहित नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मान्य सहमति की अवधारणा यह मानती है कि न्यायालय किसी अन्य संवैधानिक प्राधिकारी की भूमिका नहीं ले सकता।

समय-सीमा और शक्तियों का पृथक्करण

सीजेआई ने अपने फैसले में कहा कि समय-सीमा लागू करना संविधान द्वारा संरक्षित लचीलापन के बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने कहा कि यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा। न्यायालय द्वारा विधेयकों पर जल्दबाजी या समयसीमा थोपना संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 142 का उपयोग राज्यपाल या राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों का अधिग्रहण करने के लिए नहीं किया जा सकता।

न्यायिक समीक्षा का दायरा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक समीक्षा केवल तभी हो सकती है जब विधेयक कानून बन जाए। राष्ट्रपति या राज्यपाल को हर बार न्यायालय से परामर्श लेने की आवश्यकता नहीं है। यदि आवश्यक हो, तो अनुच्छेद 143 के तहत सलाहकार राय लेने का विकल्प हमेशा मौजूद है। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायालय का कार्य केवल विधेयकों के कानून बनने के बाद उनका मूल्यांकन करना है, न कि राज्यपाल या राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों को नियंत्रित करना।

राष्ट्रपति संदर्भ और आगे का कदम

दरअसल, इस मामले की शुरूआत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा मई 2025 में अनुच्छेद 143(1) के तहत उठाए गए 14 सवालों से हुई थी। राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से यह जानने की कोशिश की थी कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय अदालत समयसीमा तय कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा करना संविधान के तंत्र और शक्तियों के संतुलन के खिलाफ है।

इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि संविधान ने राज्यपाल और राष्ट्रपति को जो अधिकार दिए हैं, वे अदालत के आदेशों के अधीन नहीं हैं। न्यायालय किसी भी प्रकार से संवैधानिक शक्तियों का अधिग्रहण नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक ढांचे और शक्तियों के पृथक्करण की भावना को बनाए रखते हुए यह फैसला सुनाया, जिससे केंद्र और राज्य सरकारों के कार्य क्षेत्र में संतुलन बना रहे।

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