गोबर, गैस और गरिमा: जब समाधान ज़मीन से निकलता है- कर्नल पी.एस. बिंद्रा

हर सर्दी के मौसम में समाज का संवेदनशील वर्ग गरीब और ज़रूरतमंद लोगों को कंबल और गर्म कपड़े दान करता है। ये भावना सराहनीय है, लेकिन ज़मीनी हकीकत अक्सर अलग तस्वीर पेश करती है। देखा गया है कि रात में बांटे गए नए कंबल अगले ही दिन फुटपाथ या बाज़ार में बिकते नज़र आते हैं। यह किसी की नीयत पर सवाल नहीं है, बल्कि संकेत करता है कि दान की दिशा और स्वरूप पर गंभीर विचार की ज़रूरत है।

झुग्गी बस्तियों की सच्चाई

कर्नल पी.एस. बिंद्रा का कहना है कि झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग भिखारी नहीं, बल्कि मेहनतकश श्रमिक हैं,दिहाड़ी मज़दूर, घरेलू कामगार, निर्माण श्रमिक और रेहड़ी-पटरी वाले। उनकी सबसे बड़ी चुनौती ठंड नहीं, बल्कि सुरक्षित और सस्ता ईंधन है। खाना पकाने और अलाव के लिए मजबूरी में पॉलिथीन, प्लास्टिक और अन्य कचरा जलाते हैं। इससे निकलने वाला ज़हरीला धुआँ उनकी सेहत तो बिगाड़ता ही है, साथ ही पूरे शहर की हवा को भी प्रदूषित करता है।

‘परिवर्तन’ मॉडल: टिकाऊ समाधान

स्वच्छ भारत अभियान से जुड़े सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी कर्नल पी.एस. बिंद्रा ने इस समस्या का व्यावहारिक समाधान पेश किया। उनका ‘परिवर्तन’ मॉडल बताता है कि समस्या का हल दान बढ़ाने में नहीं, बल्कि सही संसाधन को सही जगह और सही तरीके से इस्तेमाल में लाने में है।

शहरों में डेयरियों से निकलने वाला गोबर आज गंभीर पर्यावरणीय समस्या बन चुका है। खुले में पड़ा यह गोबर मीथेन गैस छोड़ता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना अधिक खतरनाक होती है। कर्नल बिंद्रा के मॉडल के अनुसार, अगर शहरी डेयरियों में गोबर गैस प्लांट लगाए जाएँ, तो मीथेन गैस निकालकर खाना पकाने, सामुदायिक रसोई और अन्य उपयोगों में लाया जा सकता है। इससे मीथेन उत्सर्जन रुकेगा और स्वच्छ, सस्ती और स्थानीय ऊर्जा उपलब्ध होगी।

ईंधन, सम्मान और स्वच्छ हवा का संगम

पारंपरिक उपले बनाए जा सकते हैं। यही झुग्गी बस्तियों के लिए सबसे उपयुक्त “दान” है क्योंकि यह बाज़ार में नहीं बिकता, सीधे रोज़मर्रा के उपयोग में आता है। इससे प्लास्टिक और कचरा जलाने की मजबूरी खत्म होती है और शहर की हवा स्वच्छ होती है।

‘परिवर्तन’ मॉडल यह भी रेखांकित करता है कि दान का स्वरूप व्यावहारिक होना चाहिए। नए कंबलों की जगह पुराने लेकिन गर्म कपड़े ज्यादा प्रभावी हैं। पुराने बर्तन देना भी बेहतर विकल्प है। इससे दान का उद्देश्य पूरा होता है और उसका दुरुपयोग नहीं होता।

जब झुग्गी परिवारों को सुरक्षित ईंधन, सिगड़ी, पुराने बर्तन और पहनने योग्य कपड़े मिलते हैं, तो यह केवल सहायता नहीं, बल्कि सम्मान के साथ जीवन जीने का आधार बन जाता है। साथ ही, शहर को प्रदूषण से राहत मिलती है और पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिलता है।

आज आवश्यकता है कि प्रशासन, नगर निगम, सामाजिक संगठन और जागरूक नागरिक कर्नल पी.एस. बिंद्रा के ‘परिवर्तन’ जैसे व्यावहारिक मॉडलों को अपनाएँ। यही रास्ता स्वच्छ शहरों, स्वस्थ नागरिकों और सार्थक दान की ओर ले जाता है।

सच्चा दान वह नहीं जो दिखे, बल्कि वह है जो समस्या को जड़ से समाप्त करे।

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