बायोगैस तकनीक से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता भारत
आज दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अस्थिरता का माहौल बना हुआ है। इन परिस्थितियों का सबसे ज्यादा असर ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ता है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में रुकावट के कारण तेल और गैस की कीमतों में तेजी से उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। भारत जैसे देश, जो ऊर्जा के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं, उन्हें भी इसका असर झेलना पड़ता है। एलपीजी, डीज़ल और पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि आम लोगों के बजट पर सीधा प्रभाव डालती है। इस विषय पर कर्नल पी. एस. बिंद्रा (सेवानिवृत्त) का मानना है कि भारत को भविष्य की ऊर्जा जरूरतों के लिए अभी से टिकाऊ और स्वदेशी विकल्पों की ओर बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार बायोगैस ऐसा समाधान है जो ऊर्जा, पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तीनों के लिए लाभकारी हो सकता है।
क्या है बायोगैस और कैसे बनती है
बायोगैस एक प्राकृतिक प्रक्रिया से बनने वाली गैस है, जिसे गोबर, रसोई के कचरे, सब्जियों के छिलकों और अन्य जैविक पदार्थों से तैयार किया जाता है। इन पदार्थों को एक बंद टैंक में डालने पर सूक्ष्मजीवों की मदद से गैस बनती है, जिसका उपयोग घरों में खाना पकाने और छोटे स्तर पर ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जा सकता है।आज के समय में आधुनिक और पोर्टेबल बायोगैस प्लांट उपलब्ध हैं जिन्हें घर, खेत, गौशाला या हाउसिंग सोसायटी में आसानी से लगाया जा सकता है। इन प्लांटों के माध्यम से लोग अपने परिसर में ही स्वच्छ ईंधन तैयार कर सकते हैं।
ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
बायोगैस का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे बाहरी ईंधन स्रोतों पर निर्भरता कम होती है। यदि गांवों और शहरों में बड़े पैमाने पर बायोगैस संयंत्र लगाए जाएं, तो एलपीजी सिलेंडरों की मांग काफी हद तक घट सकती है। इससे परिवारों का खर्च कम होगा और देश की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी।
कचरा प्रबंधन में प्रभावी भूमिका
भारत के शहरों में बढ़ता कचरा एक बड़ी समस्या बन चुका है। हर दिन बड़ी मात्रा में जैविक कचरा डंपिंग ग्राउंड में जमा हो जाता है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है। बायोगैस तकनीक इस समस्या का प्रभावी समाधान बन सकती है। यदि घरों, होटलों, रेस्तरां और सामुदायिक रसोइयों में बायोगैस प्लांट लगाए जाएं, तो रसोई का कचरा गैस उत्पादन के लिए उपयोग किया जा सकता है। इससे कूड़े के ढेर कम होंगे और पर्यावरण को भी लाभ मिलेगा।
जैविक खाद से कृषि को फायदा
बायोगैस उत्पादन के बाद जो अवशेष बचता है उसे स्लरी कहा जाता है। यह एक पोषक जैविक खाद होती है, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती है। किसान इसका उपयोग करके रासायनिक खाद पर निर्भरता कम कर सकते हैं और टिकाऊ खेती को बढ़ावा दे सकते हैं।
आवारा पशुओं की समस्या का समाधान
देश के कई शहरों और राजमार्गों पर आवारा पशुओं की समस्या लगातार बढ़ रही है। इससे सड़क दुर्घटनाएं होती हैं और किसानों की फसलों को भी नुकसान पहुंचता है। यदि गोबर को ऊर्जा का मूल्यवान स्रोत बना दिया जाए तो पशुओं का आर्थिक महत्व बढ़ सकता है। सूखी गाय भी प्रतिदिन गोबर देती है, जिससे गैस और जैविक खाद दोनों तैयार हो सकते हैं। इससे पशुपालकों को भी आर्थिक लाभ मिलेगा और पशुओं को सड़कों पर छोड़ने की प्रवृत्ति कम हो सकती है।
राष्ट्रीय स्तर पर बायोगैस मिशन की जरूरत
भारत में करोड़ों पशुधन, कृषि अवशेष और जैविक कचरा उपलब्ध है, जो बायोगैस उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण संसाधन हैं। यदि सरकार राष्ट्रीय स्तर पर बायोगैस मिशन शुरू करे तो गांवों, कस्बों और शहरों में ऊर्जा उत्पादन का एक नया मॉडल विकसित किया जा सकता है। छोटे प्लांट घरों के लिए, मध्यम प्लांट किसानों और डेयरी मालिकों के लिए तथा बड़े संयंत्र गौशालाओं, ढाबों और बड़े भोजनालयों के लिए लगाए जा सकते हैं।
नीति और जागरूकता जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि बायोगैस को बढ़ावा देने के लिए मजबूत सरकारी नीति, आकर्षक सब्सिडी और व्यापक जनजागरूकता अभियान जरूरी हैं। जिस तरह सौर ऊर्जा और एलपीजी को प्रोत्साहन मिला है, उसी तरह बायोगैस को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। कर्नल पी. एस. बिंद्रा के अनुसार सही नीतियों, तकनीक और जनभागीदारी के साथ बायोगैस एक बड़े राष्ट्रीय समाधान के रूप में उभर सकती है। इससे कचरा कम होगा, स्वच्छ ऊर्जा बढ़ेगी और देश ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बन सकेगा।
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