शहरों की पहचान बन चुके डस्टबिन और उनके पीछे छिपा ज़हरीला यथार्थ
किसी भी शहर में दाख़िल होते ही अगर सबसे पहले नज़र बड़े हरे रंग के लोहे के सार्वजनिक डस्टबिनों पर पड़ती है, तो समझ लेना चाहिए कि शहर ने बिना बोले अपना परिचय दे दिया है। रंग भले ही हरा हो, लेकिन इनका पर्यावरण से रिश्ता उतना ही खोखला है, जितना धुएँ का साफ हवा से। देखने में ये स्वच्छता के प्रतीक लगते हैं, पर असल में ये गंदगी, बीमारी और लापरवाही के स्मारक बन चुके हैं।
कर्नल पी.एस. बिंद्रा जी ने लिखा है कि शहर में नया आने वाला व्यक्ति इन्हें देखकर असहज हो जाता है। बदबू, बिखरा कचरा और उड़ता धुआँ उसे चौंकाता है। उसे लगता है कि यह तो खुलेआम की जा रही गलती है। लेकिन जो लोग यहां रहते हैं, वे इन डस्टबिनों को रोज़ देखते हैं, सूंघते हैं, झेलते हैं और फिर भी अनदेखा कर देते हैं। आदत इतनी गहरी हो चुकी है कि गंदगी अब समस्या नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की पृष्ठभूमि बन गई है।
डस्टबिन और शहर की रोज़मर्रा की जटिलता
फुटपाथों पर, बस स्टैंड के पास, स्कूलों के सामने और हाईवे किनारे रखे ये लोहे के डस्टबिन किसी जंग के बाद बचे टैंकों जैसे दिखाई देते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ये हर दिन ज़हर छोड़ते हैं। इनमें जमा कचरा धीरे-धीरे सड़ता है, फिर किसी “जिम्मेदार” हाथ से आग लगा दी जाती है। पहले सूखी पॉलीथिन जलती है, फिर प्लास्टिक और फिर मिला-जुला कचरा। कुछ ही मिनटों में घना धुआँ उठता है, जो ठंडी हवा और धूल के साथ मिलकर सड़क पर अदृश्य दीवार खड़ी कर देता है।
कर्नल पी.एस. बिंद्रा जी ने लिखा है कि इस धुएँ का असर तुरंत दिखता है। बच्चे खांसने लगते हैं, बुजुर्गों की चाल थम जाती है, और हाईवे पर चलते वाहन लड़खड़ाने लगते हैं। कई बार अचानक ब्रेक लगते हैं, पशु सड़क पर आ जाते हैं और हादसे हो जाते हैं। कारण अक्सर कोहरे को बताया जाता है, जबकि हकीकत में वह कोहरा नहीं, वही धुआँ होता है जिसे हम रोज़ अपने ही हाथों से पैदा करते हैं।
डस्टबिन का गणित और सफाई की विडंबना
कागज़ों में लिखा होता है कि हर दो दिन में कचरा उठाया जाता है। ज़मीन पर सच्चाई यह है कि पहले कौए, कुत्ते, बंदर और गाय कचरे को “छांट” लेते हैं। इंसानी हस्तक्षेप बाद में होता है, जब कचरा हटाने के बजाय उसे जला देना सबसे आसान रास्ता मान लिया जाता है। सफाई करवाई जाती है, उसी कूड़े को आग के हवाले किया जाता है और फिर सारी ज़िम्मेदारी सरकार या नगर पालिका पर डाल दी जाती है।
बरसात के मौसम में यही डस्टबिन और भी खतरनाक रूप ले लेते हैं। नीचे पानी भरता है, ऊपर कचरे की परत। मच्छरों के लिए यह किसी पांच सितारा होटल से कम नहीं। मलेरिया, डेंगू और इंसेफेलाइटिस जैसी बीमारियाँ यहीं से जन्म लेती हैं और पूरे शहर में फैल जाती हैं।
कर्नल पी.एस. बिंद्रा जी ने लिखा है कि लगातार जलने से इन डस्टबिनों की लोहे की चादर एक साल में ही छेददार हो जाती है। तब शिकायत करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, नया डस्टबिन अपने आप आ जाता है। कागज़ों में उसकी उम्र दस साल होती है, लेकिन व्यवहारिक गणित में वह मुश्किल से एक साल चल पाता है।
बच्चों की नज़रों में हरे डस्टबिन
एक और अनकहा हिसाब नीलामी का भी है। ये डस्टबिन स्क्रैप में तो गिने जाते हैं, पर नीलाम नहीं होते। कहा जाता है कि इनकी “रेसिडुअल लाइफ” बाकी है। वरना शायद नीलामी में भी कुछ हाथ हरे हो जाते।
सबसे सटीक टिप्पणी बच्चों ने की है। बस स्टैंड पर खड़े बच्चे इन डस्टबिनों को नए नाम दे रहे थे—“स्मोक बिन”, “डिजीज़ बिन”, “मच्छर बिन”, “इनकम बिन” और “डेथ बिन”। इनकम इसलिए कि डस्टबिन वहीं खड़ा है, कचरा नहीं उठा, लेकिन फाइलें चलती रहीं। डेथ इसलिए कि इसका धुआँ सांसों पर भारी पड़ता है।
विडंबना यह है कि एक ओर हम नई कार पर प्रदूषण प्रमाणपत्र न होने पर चालान काटते हैं, और दूसरी ओर खुले में कचरा जलाना हमें सामान्य प्रक्रिया लगता है। चारों तरफ बड़े अक्षरों में लिखा होता है—स्वच्छ शहर, हरित शहर।
कर्नल पी.एस. बिंद्रा जी ने लिखा है कि शायद अब सवाल यह नहीं है कि डस्टबिन हरे क्यों हैं। असली सवाल यह है कि हमारी आंखें कब खुलेंगी, ताकि हम इन्हें हरा नहीं, बल्कि खतरनाक देख सकें।




